Vyanjan sandhi , vyanjan sandhi kise kahate hain,(व्यंजन संधि क्या हैं ,परिभाषा भेद एवं उदाहरण – सम्पूर्ण व्यख्या।)

Vyanjan sandhi , vyanjan sandhi kise kahate hain ,( व्यंजन संधि क्या हैं ,परिभाषा भेद एवं उदाहरण):

आप व्यंजन संधि के बारे में जानकारियां प्राप्त करना चाहते हैं तो यह Articles आपके लिए बहुत महत्पूर्ण होने वाली हैं क्योंकि इस पेज में व्यंजन संधि के सम्बंधित हर तरह की जानकारियां प्रदान की गई हैं जो आपके लिए बहुत महत्पूर्ण होंगें और  आपको Vyanjan sandhi के बारे में सम्पूर्ण जानकारियाँ मिलने वाली हैं ।

परिचय – आप संधि के बारे में आवश्यक जानते होंगें इसमें दो वर्णो का मेल होता हैं जिस मेल के कारण  कोइ नया वर्ण की उत्पति होती हैं अथवा कोइ विकार उत्पन्न होता हैं , विकार उत्पन होने का मतलब किसी नए वर्ण का बनना ही होता हैं और यह क्यों कैसे होता हैं वह तो किसी शब्द का संधि करने पर ही अच्छी तरह से समझ में आते हैं। हम किसी शब्द का संधि करते हैं या उसका संधि विच्छेद करते हैं यही सब तो सीखा जाता हैं ।

 

vyanjan sandhi kise kahate hain

 

व्यंजन संधि किसे कहते हैं/परिभाषा –  

व्यंजन वर्ण के साथ व्यंजन वर्ण अथवा स्वर वर्ण के मेल से जो विकार उत्पन होता हैं उसे ही व्यंजन संधि कहा जाता हैं । इतना तो आप आवश्य जानते हैं कि संधि दो वर्णो के मिलने से होती हैं अतः जिन दो वर्ण में संधि होती हैं उनमें  पहला वर्ण व्यंजन हो तथा दूसरा वर्ण स्वर हो या व्यंजन कोइ भी हो और इनके मिलने से जो विकार उत्पन्न होता हैं उसे व्यंजन संधि कहा जाता हैं , कुल मिलकर बात यह हैं कि पहला ध्वनि(वर्ण) व्यंजन हो और उसके बाद भी दूसरा ध्वनि व्यंजन या स्वर ध्वनि कोइ भी हो(मतलब स्वर व्यंजन में कोइ भी हो ) तो इनके मिलने से जो विकार उत्पन्न होंगें वह व्यंजन संधि कहा जायेगा । शायद अब आप पूर्ण रूप से समझ गए होंगें कि व्यंजन संधि क्या हैं । एक बात ध्यान देना हैं कि संधि को समझने के लिए हिंदी वर्णमाला को अच्छी तरह से समझना होगा नहीं तो आप संधि को कभी नहीं समझ सकते हैं और न किसी शब्द का संधि कर पायेंगें और न ही संधि विच्छेद ,थोड़ा सा जानकारी स्वर ,व्यंजन वर्ण के बारे दें रहे हैं शायद अभी के लिए आपको कुछ सहायता मिल सकते हैं ।

(ध्यान दें – अ , आ , इ , ई , उ , ऊ , ए , ऐ , ओ , औ , ऋ   को  स्वर वर्ण कहते हैं तथा क ,ख , ग , घ – – – – – – – – – – से  ह , क्ष , त्र , ज्ञ तक व्यंजन वर्ण हैं साथ में अन्य व्यंजन भी हैं जिसे आप वर्णमाला में पढें होंगें ) 

 

इन्हें भी पढ़ें – वर्णमाला किसे कहते हैं ।

 

 

व्यंजन संधि के उदाहरण (vyanjan sandhi ke udaharan):

जैसे – वाक् + ईश = वागीश  ( इसमें व्यंजन ध्वनि और स्वर ध्वनि का योग हुवा हैं ) 

जगत + ईश = जगदीश।

दिक् + गज = दिग्गज ।

भगवत + भक्ति = भगवतभक्ति ।

दिक् + अम्बर = दिगम्बर ।

वाक् + जाल = वाग्जाल , इत्यादि ।

 

व्यंजन संधि के महत्पूर्ण नियम : – इसके नियम किसी शब्द के संधि करने या विच्छेद करने में अहम् भूमिका निभाती हैं, यूँ  कहे तो इसके नियमों को जानने के बाद ही व्यंजन संधि को पूर्ण रूप से समझ सकते हैं जो नियम निम्नलिखित हैं ।

नियम-1 . जब किसी वर्ग का पहला वर्ण किसी अन्य वर्ग के तीसरे अथवा चौथे वर्ग से मिलता हैं या किसी अन्य स्वर वर्ण के साथ मिलता हैं तो अपने वर्ग का तीसरा वर्ण बन जाता हैं । अर्थात कहने का मतलब हैं किसी भी वर्ग के पहला अक्षर(वर्ण) जैसे- क , च ,ट , त , प के बाद कोइ भी वर्ग का तीसरा या चौथा वर्ण आता हैं अथवा कोइ भी स्वर वर्ण आता हैं तो (क , च ,ट , त , प) वर्ग के स्थान पर इनके तीसरा वर्ण आ जाता हैं ।

मतलब का तीसरा वर्ण ‘‘ 

का तीसरा वर्ण ‘ज’ 

का तीसरा वर्ण ‘ड‘ 

का तीसरा वर्ण ‘द’ और 

का तीसरा वर्ण हो जाता हैं । 

एक बात आप ध्यान दीजिए संधि को उदाहरण से ही आसानी से समझा जा सकता हैं नहीं तो बातें सर के ऊपर से भागते रहते हैं इसलिए कुछ उदाहरण से समझते हैं जो निम्नलिखित हैं ।

(i) उत + ऐति   = उदेति ( यहाँ पर उत के अंतिम वर्ण हैं और के बाद वर्ण आया हैं जो कि संधि करने पर त  का तीसरा वर्ण हो गया हैं  इसतरह पुरे शब्द उदेति बन गया हैं । एक बात तो आपको जरूर पता होगा कि संधि में समय प्रथम पद के अंतिम वर्ण और दूसरे पद के प्रथम वर्ण का मेल होता हैं यदि संधि के बारे में नहीं जानते हैं कि ‘संधि क्या होता हैं’ तो सबसे पहले सिर्फ संधि के बारे में जानकारी प्राप्त कीजिए तब उनके भेदों को समझ पायेंगें ।

(ii) जगत + ईश्वर  =  जगदीश्वर ( यहाँ पर जगत के अंतिम वर्ण हैं और दूसरा पद ईश्वर के प्रथम वर्ण    हैं जो कि एक स्वर वर्ण हैं इस तरह दोनों के संधि होने पर के तीसरा वर्ण बन गया हैं )

(iii) दिक् + भ्रम = दिग्भ्रम ।

(iv) वाक् + दत्त = वाग्दत्त ।

(v) सत + उक्ति = सदुक्ति , इत्यादि हो सकते हैं ।

 

 

Vyanjan sandhi

 

 

2 . किसी वर्ग का पहला वर्ण( क, च ,ट ,ट ,प ) के बाद उसी वर्ग का पाँचवा अक्षर आए तो प्रथम वर्ण के स्थान पर उसी वर्ग का पाँचवा वर्ण हो जाता हैं , दूसरे शब्दों में कहे तो किसी वर्ग का पहला वर्ण आगे आने वाले अनुनासिक से मिलता हैं तो उसी वर्ग का पाँचवा वर्ण बन जाता हैं । आपको बता दें की संधि में जब तक उदाहरण को नहीं देखते हैं तब तक इसका नियम भी जल्दी समझ में नहीं आते हैं इसलिए इसे उदाहरण से समझते हैं जो निम्नलिखित हैं ।

जैसे – (i) जगत + नाथ = जगन्नाथ ( आप यहाँ ध्यान से देखिए प्रथम शब्द जगत का अंतिम वर्ण हैं और उसके बात दूसरे शब्द नाथ के प्रथम वर्ण हैं मतलब वर्ग के बाद  उसी के पाँचवा वर्ण  या अनुनासिक वर्ण  आया हैं अब  संधि होने पर  उसी वर्ग के पाँचवा वर्ण बन जाता हैं ।)

(ii) उत + नय = उन्नत ।

(iii) मृत + मय = मृण्मय ( यहाँ पर वर्ण के बाद प वर्ग के पाँचवा वर्ण म आया हैं इसलिए संधि होने पर वर्ग का पाँचवा वर्ण आया हैं )

(iv) तत + मय = तन्मय ।

(v) षट + मास = षण्मास ।

 

(ध्यान दें – क वर्ग का मतलव  क , ख , ग , घ , ड. होता हैं । च वर्ग का मतलब च , छ , ज , झ , ञ होता हैं । त वर्ग – त , थ , द , ध , ण होता हैं , अब आप ट वर्ग और प वर्ग का भी मतलब  समझ गए होंगें । दूसरी बात जिस वर्ण का उच्चारण नाक से होता हैं उसे अनुनासिक कहा जाता हैं।)

 

 

3 . के आगे कोइ स्वर या ग , घ , द , ध , ब , भ , अथवा य , र , ल , व्  रहे तो के स्थान पर हो जाता हैं ।

जैसे – सत + आचार = सदाचार ।

उत + गम = उद्गम ।

उत + योग = उद्योग ।

उत + यान = उद्यान ।

सत + गुरु = सदगुरु ।

आप समझ गए होंगें के बाद कोइ स्वर वर्ण आता हैं अथवा   ग , घ , द , ध , ब , भ  या य , र , ल , व् में से कोइ भी वर्ण ।

(ध्यान दें – इतना तो आप जरूर जानते हैं की संधि दो वर्णो के मेल से होता हैं लेकिन महत्पूर्ण बात यह समझना हैं की किसी शब्द के अंतिम वर्ण और दूसरे शब्द के प्रथम वर्ण के साथ मेल होता हैं मतलब दोनों वर्ण जुड़ता हैं इसे समझने के लिए ‘संधि क्या होता हैं’ इसके बारे में आवश्यक जानकारियां प्राप्त करें ।)

 

 

4 .  के बाद या हो तो-

के बदले में तथा

के बदले में हो जाता हैं ।

जैसे – उ + छेद = उच्छेद ।

+ शिष्ट = उच्छिष्ट ।

उत + शृंखला  = उच्छृंखला इत्यादि ।

 

 

के पश्चात हो तो , के बदले में   तथा के बदले में हो जाता हैं ।

जैसे – उत + हत = उद्धत ।

उत + हरण = उद्धरण ।

तत + हित = तद्धित आदि ।

 

 

Vyanjan sandhi

 

 

6  के बाद क , त , प , स हो तो संयुक्त हो जाता हैं ।

जैसे – उत + पाद = उत्पाद । ( यहाँ पर के बाद आया हैं इसलिए संयुक्त हो गया हैं ) 

तत + काल = तत्काल

सत + संग = सत्संग इत्यादि ।

 

 

7 . किसी वर्ग के प्रथम वर्ण के पश्चात , किसी वर्ग का पाँचवा वर्ण रहे तो  प्रथम वर्ण के बदले में उस वर्ग का पाँचवा वर्ग  हो जाता हैं ।

जैसे – (i) उत + नति = उन्नति । ( यहाँ पर प्रथम वर्ण हैं इसके बाद आया हैं जो की वर्ग का पाँचवा वर्ण हैं तो प्रथम वर्ण के बदले में उसी वर्ग का पाँचवा वर्ण बन गया हैं।)

(ii) उत + माद = उन्माद ।

(iii) सत + मार्ग = सन्मार्ग ।

(iv) उत + मत = उन्मत इत्यादि ।

 

 

 8 . के बाद हो तो के बदले में  ज्ञ हो जाता हैं ।

जैसे – (i) यज + न = यज्ञ ।

(ii) राज + नी = राज्ञी ।

 

 

9 . के पश्चात् किसी वर्ग का कोइ भी वर्ण हो तो के बदले में उस वर्ग का पाँचवा वर्ण हो जाता हैं ।

जैसे – किम + तु = किन्तु ।

परम + तु = परन्तु ।

शम + कर = शंकर ।

शाम + ति = शांति

अलम +  कार = अलंकार ।

 

 

10 . के बाद अंतःस्थ या उष्म वर्ण रहे तो , के बदले में अनुस्वार हो जाता हैं ।

जैसे – सम + यम = संयम ।

सम + वाद = संवाद ।

सम + हार = संहार ।

सम + योग = संयोग ।

स्वयम + वर = स्वयंवर आदि ।

 

11 .  न् या म् के पश्चात् स्वर-वर्ण रहे, तो दोनों के मिलकर संयुक्त होता हैं और  हल का चिह्न लुप्त हो जाता है ।

जैसे– अन् +अन्त=अनन्त
अन् + अन्य = अनन्य
अन् + अभिज्ञ= अनभिज्ञ ।
अन् + उदार=  अनुदार ।
अन् + उपयोगी = अनुपयोगी इत्यादि ।
12. के बाद या हो, तो के बदले में तथा के बदले में होता है।
जैसे- अष् + त = अष्ट।
शिष् + त = शिष्ट।
इष् + त = इष्ट ।
पृष् + त = पृष्ट ।
कष् + त = कृष्ट ।
दुष + त = दुष्ट
ओष् + थ = ओष्ठ इत्यादि ।
13. मूल या दीर्घ स्वर के पश्चात् रहे तो के पहले एक च् की वृद्धि होती है।
जैसे- अनु + छेद = अनुच्छेद
वि + छिन्न = विच्छिन्न
Vyanjan sandhi
14. सम् या परि उपसर्ग और कृ धातु का संयोग हो, तो दोनों के मध्य सू, ष् की वृद्धि होती है ।
जैसे – सम् + कृत = संस्कृत
परि + कार = परिष्कार ।
सम् + कार= संस्कार ।
परि + करण = परिष्करण ।
सम् + क्रिया=  संस्क्रिया ।
परि + कृत = परिष्कृत इत्यादि ।
15. यदि ऋ, र या के परे रहे और इनके मध्य में चाहे कोइ स्वर वर्ण  , कवर्ग, पवर्ग अनुस्वार, य, व, ह  रहे तो के स्थान में होता है ।
जैसे- ॠ + न = ऋण ।
भर + अन = भरण ।
राम + अयन= रामायण
प्र + मान = प्रमाण
भूष् + अन = भूषण
तृष् + ना = तृष्णा
कृष् + न = कृष्ण
16. संस्कृत के यौगिक शब्दों के प्रथम शब्द के अन्त में यदि न्  हो तो उसका लोप हो जाता है ।
जैसे –
मन्त्रिन् + मण्डल = मंत्रिमण्डल ।
हस्तिन् + दन्त = हस्तिदन्त ।
प्राणिन् + मात्र = प्राणिमात्र ।
राजन् + आज्ञा = राजाज्ञा इत्यादि ।

Vyanjan sandhi

 

17. संस्कृत के अहन् शब्द के परे किसी भी वर्ण के आने पर न् के स्थान में र् होता है।
जैसे- अहन्+ निश = अहर्निश
अहन् + मुख = अहर्मुख ।

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