kriya ke kitne bhed hote hain , kriya ke kitne bhed hai (क्रिया कितने प्रकार/भेद के होते हैं , उदाहरण सहित ।)

kriya ke kitne bhed hote hain , kriya ke kitne bhed hai (क्रिया कितने प्रकार के होते हैं , उदाहरण सहित ।) :

परिचय – यदि आप क्रिया एवं उनके भेदों के बारे में जानकारी प्राप्त चाहते हैं तो यह articles आपके लिए बहुत महत्पूर्ण होने वाली हैं क्योंकि इस पेज में क्रिया के सम्बंधित सभी जानकारियां दी गई हैं जो आपके लिए बहुत उपयोगी हैं ।

क्रिया की परिभाषा की बात करें तो जो परिभाषा हिंदी व्याकरण के लिए देते हैं यदि वही परिभाषा संस्कृत व्याकरण या अंग्रेजी व्याकरण( english grammar) के लिए देंगें तो कभी गलत नहीं होगा क्योंकि परिभाषा सभी के लिए बराबर हो सकता हैं परन्तुउपयोग बराबर कभी नहीं हो सकता हैं इनके उपयोग में भिन्नता पाई जाती हैं ,हिंदी व्याकरण ,अंग्रेजी व्याकरण और संस्कृत व्याकरण के उपयोग में अंतर हैं जिसे समझना बहुत जरूरी होता हैं अतः इस पेज में हिंदी व्याकरण के ‘क्रिया’ और kriya ke kitne bhed hote hain (क्रिया के कितने भेद होते हैं) और इसके बारे में सभी जानकारिया प्राप्त करेंगें।

 

kriya ke kitne bhed hai  

 

क्रिया के भेद (kriya ke kitne bhed hote hain) इसके बारे में जानने से पहले थोड़ा क्रिया के बारे में जान लेते है  ताकि इनके भेदों को समझने में आसानी हो नहीं तो पेज के थोड़ा निचे जाकर सिर्फ इनके भेदों को पढ़ सकते हैं ।

आप ये जान चुके होंगें कि क्रिया के परिभाषा सभी व्याकरण(grammar) के लिए बराबर होते हैं लेकिन इनके भेदों में भिन्नता पाई जाती हैं जो भिन्ताएँ एक दूसरे को अलग करते हैं , आप तो यह जरूर जानते होंगें की अंग्रेजी व्याकरण में क्रिया(verb) के पाँच form( रूप ) होते हैं लेकिन हिंदी व्याकरण में नहीं होते हैं और संस्कृत व्याकरण में अलग रूप होते हैं अतः इन्ही सब बातें को ध्यान में रखते हुए  हम सिर्फ हिंदी व्याकरण के लिए अध्ययन करेंगें ।

 

क्रिया के परिभाषा – जिसके द्वारा कोइ कार्य सम्पन होता हैं अथवा जिसके द्वारा किसी कार्य के होने का बोध होता हैं वही क्रिया कहलाता  हैं , वास्तव में क्रिया मूल रूप से धातु हैं इसलिए क्रिया को धातु भी कहा जाता हैं बस थोड़ी सी अंतर हैं जो अंतर हमें समझ लेना चाहिए  इसके लिए धातु को भी समझना पड़ेगा की धातु क्या होता हैं तो जिस मूल रूप से क्रिया बनती हैं वही धातु कहा जाता हैं जैसे की पढ़ना क्रिया में ‘पढ़’ धातु हैं और इस प्रकार मूल धातु में  ‘ना’जोड़कर क्रिया बनाई जाती हैं जैसे – खा + ना = खाना , पी + ना = पीना , गा + ना =  गाना , चल + ना = चलना आदि जो सब क्रिया हैं , अब बाकी क्रिया के बारे में बाद में जानकारी प्राप्त करेंगें अभी तो सिर्फ इनके भेद के बारे में जानकारी चाहिए ।

क्रिया के उदाहरण ( kriya ke udaharan) (i) श्याम घर जाता हैं इसमें जाना क्रिया  हैं क्योंकि कर्ता( श्याम) को घर जाना हैं जिसके लिए उसे कार्य करना होगा अर्थात चलना होगा और चलना मतलब जाना होता हैं ।  (ii) वह खाना खाता हैं , इसमें खाना क्रिया हैं क्योंकि खाना के द्वारा कार्य सम्पन हो रही हैं ।

[ध्यान दें –आप Reality पर ध्यान दीजिए क्रिया के बारे में आप किताबों को पढ़कर खुद एक अपना विचार प्रस्तुत कीजिए सोचिए कि बातें क्या कही जा रही हैं क्योंकि क्रिया को किताबों ने भी थोड़ा खिचड़ी बना कर रखा हैं जो विद्यार्थी को Confused(असंगत/अस्पष्ट) में डाल देते हैं किसी में कुछ तो, किसी में कुछ बता रखा हैं] 

 

 

क्रिया के भेद अथवा क्रिया के प्रकार :

कर्म -फल या कर्म के अनुसार क्रिया के दो भेद हैं –

1 . सकर्मक क्रिया 

2 . अकर्मक क्रिया 

 

प्रयोग कि दृष्टि से क्रिया  के पाँच भेद होते है :

1. सामान्य क्रिया –

2. संयुक्त क्रिया-

3. प्रेरणार्थक क्रिया-

4. नामधातु क्रिया-

5. पूर्वकालिक क्रिया-

6 .विधि क्रिया-

7.सहायक क्रिया –

 

 

 

kriya ke kitne bhed hote hain

व्याख्या –

1. सामान्य क्रिया – जब किसी वाक्य में  एक क्रिया का प्रयोग हो, तो उसे सामान्य क्रिया कहा जाता हैं ।

जैसे – वह खाया , वह गया , उसने बोला , मैंने खाया आदि ।

 

 

2. संयुक्त क्रिया – जब एक से अधिक क्रियाओं का प्रयोग एक साथ हो तो उसे संयुक्त क्रिया कहते हैं। इस प्रकार की क्रिया एक से अधिक धातुओं के मेल से बनती है।

जैसे- वह खा चुका हैं  वह रोने लगा । वह  चला  गया है , मोहन सो चूका हैं इत्यादि संयुक्त क्रियाएँ हैं।

 

 

3. प्रेरणार्थक क्रिया- जब किसी वाक्य का ‘कर्ता’ किसी दूसरे से काम करवाता है, तो उस वाक्य की क्रिया को प्रेरणार्थक क्रिया कहते हैं। जैसे—काटना से कटवाना, गिरना से गिरवाना, भरना से भरवाना, पीटना से पिटवाना आदि । इस प्रकार क्रियाओं के दो रूप बनते हैं।

 

 

4. नामधातु क्रिया – संज्ञा’ या ‘विशेषण’ शब्दों से बनी हुई क्रिया को नामधातु क्रिया कहते हैं।

जैसे- लाज से लजाना । ठंडा से ठंडियाना । हाथ से हथियाना । गर्म से गर्माना। शर्म से शर्माना आदि।

5. पूर्वकालिक क्रिया- जब कर्ता एक क्रिया को समाप्त कर, दूसरी क्रिया  करने लगता है, तो पहली क्रिया को पूर्वकालिक क्रिया कहते हैं।

जैसे- वह खाकर सोता है ( इस वाक्य में ‘खाकर’ क्रिया पूर्वकालिक है ।)

वह पढ़कर सोता हैं , श्याम हँस कर बोलता हैं ।

 

 

6 .विधि क्रिया- जिस क्रिया से किसी प्रकार की आज्ञा का बोध हो, उसे विधि क्रिया कहते हैं।

जैसे—घर जा , ठहर जा , सो जा आदि ।

 

 

7.सहायक क्रिया – जो क्रिया मुख्य क्रिया कि सहायता करता  है उसे सहायक क्रिया कहते हैं।

जैसे – राम जाता है।

मैं पढ़ता हूँ।

वह गया था।

हमलोग सो रहे हैं।  इन वाक्यों में जाना, पढ़ना, सोना मुख्य क्रियाएँ हैं। इसके अलावा ‘है  , हूँ   , था , रहे हैं’ मुख्य क्रिया को स्पष्ट करनेवाली सहायक क्रियाएँ हैं। इसके आलावा इनके और भी कई  सारे उदहारण हो सकते हैं, जैसा कि मैं पटना जा रहा हूँ , रमेश पढ़ रहा हैं , वे लोग खा रहा हैं आदि ।

 

 

kriya ke kitne bhed hote hain
अब संयुक्त क्रिया के 11 भेद हैं , जो निम्नलिखित हैं ।
1. आरम्भ-बोधक- जिस संयुक्त क्रिया से किसी क्रिया के आरम्भ होने का बोध हो तो वह आरम्भ बोधक संयुक्त क्रिया कहा जाता हैं ।
जैसे- पढ़ने लगना ।
गाने लगना।
खेलने लगना
नाचने लगा इत्यादि । क्रिया के सामान्य रूप  को ‘ना’ को ‘ने’ करके और आगे ‘लगना’ लगाने से आरम्भ-बोधक क्रियाएँ बनती हैं ।
2. समाप्ति बोधक- जिस संयुक्त क्रिया से मुख्य क्रिया की पूर्णता समाप्ति का बोध हो तो वह समाप्ति-बोधक संयुक्त क्रिया कहा जाता है ।
जैसे- वह पढ़ चुकी हैं ।
सीता खा चुकी है ।
राम पढ़ चुका है ।
राधा गा चुकी हैं , आदि  धातु( क्रिया ) के आगे ‘चुकना’ जोड़ने से समाप्ति-बोधक संयुक्त क्रियाएँ बनती हैं ।
3 .अवकाश-बोधक- जिससे क्रिया को निष्पन्न करने के लिए अवकाश का बोध हो तो वह अवकाश-बोधक संयुक्त क्रिया कहा जाता है ।
जैसे- वह मुश्किल से पढ़  पाया ।
वह जाने न पाया ।
वह रह नहीं पाया , आदि ।
4 .अनुमति-बोधक- जिससे कार्य करने की अनुमति देने का बोध हो, वह अनुमति-बोधक संयुक्त क्रिया है ।
जैसे– मुझे जाने दो ।
हमें पढ़ने दो ।
उसे खाने दो , आदि ।
5 . नित्यता-बोधक- जिससे कार्य की नित्यता का बोध हो  उसके बन्द न होने का भाव प्रकट हो तो वह नित्यता-बोधक’ संयुक्त क्रिया कहा जाता है ।
जैसे- हवा चलती रही है ।
पेड़ बढ़ता गया ।
वह काम करता रहेगा ।
लड़की पढ़ती रहेगी , आदि । वर्त्तमानकालिक कृदन्त के आगे ‘आना’, ‘जाना’ या ‘रहना’ क्रिया जोड़ने से नित्यता-बोधक
क्रिया बनती है ।
6 . आवश्यकता-बोधक- जिससे आवश्यकता या कर्त्तव्य का बोध हो, वह आवश्यकता-बोधक
संयुक्त क्रिया है ।
जैसे- हमें  लड़कों को पढ़ाना पड़ता है ।
उसे घर जाना पड़ता हैं ।
श्याम  को यह काम करना चाहिए ।  मुख्य क्रिया के साथ ‘पढ़ना’ ‘होना’ या ‘चाहिए’ क्रियाओं को जोड़ने से आवश्यकता-बोधक संयुक्त क्रियाएँ बनती हैं ।
7. निश्चय-बोधक- जिस संयुक्त क्रिया से मुख्य क्रिया के कार्य का निश्चय जाना जाय तो  वह निश्चय-बोधक संयुक्त क्रिया है ।
जैसे- राम बोल उठा ।
राम मार बैठा । धातु  में उठना, बैठना आना, जाना, पड़ना, डालना, लेना, देना, चलना, रहना आदि लगाने से निश्चय-बोधक संयुक्त क्रियाएँ बनती हैं। इस प्रकार की क्रियाओं में पूर्णता और नित्यता के भाव रहते हैं ।
8. इच्छा-बोधक- जिससे क्रिया करने की इच्छा प्रकट होती है, उसे इच्छा-बोधक संयुक्त
क्रिया कहते हैं ।
जैसे- वह आना चाहता है।
मैं दौड़ना चाहता हूँ , आदि । क्रिया के साधारण रूप में ‘चाहना‘ क्रिया के रूप लगाने से इच्छा-बोधक संयुक्त क्रियाएँ बनती हैं।
9. अभ्यास-बोधक- जिससे क्रियाओं के करने के अभ्यास का बोध हो तो वह अभ्यास बोधक क्रिया कहा जाता  है ।
जैसे- वह पढ़ा करता है ।
तुम लिखा करते हो । (सामान्य भूतकाल की क्रिया में ‘करना’ क्रिया के रूप लगाने से अभ्यास-बोधक संयुक्त
क्रियाएँ बनती हैं ।)
kriya ke kitne bhed hote hain
10. शक्ति-बोधक- जिससे कार्य करने की शक्ति का बोध हो तो उसे शक्ति-बोधक संयुक्त क्रिया कहा जाता हैं ।
जैसे- वह चल सकता है।
वह घर जा सकता हैं ।
राधा नाच सकती हैं ।
मैं लिख सकता हूँ आदि (इसमें संयुक्त क्रिया के दूसरे भाग में ‘सकना’ क्रिया के रूप होते  हैं ।)
 11 . पुनरुक्त संयुक्त क्रियाएँ- जब दो समान अर्थवाली या समान ध्वनि वाली क्रियाओं का संयोग होता है  तब उन्हें पुनरुक्त संयुक्त क्रिया कहते हैं
जैसे- वह पढ़ा-लिखा करता है ।
अरुण काम -धंधा करता हैं ।
मैं यहाँ आया-जाया करता हूँ ।
कल खाना-पीना होगा आदि ।
पुनरुक्त संयुक्त क्रियाओं में दोनों क्रियाओं का रूपान्तर होता है लेकिन  सहायिका क्रिया केवल
पिछली क्रिया के साथ आती है ।
इन्हें भी पढ़ें – 1 verb किसे कहते हैं ?

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